शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

कविगुरू रवींद्रनाथ

आज का दिन कविगुरू रवींद्रनाथ की जयंती के अलावा फासीवाद पर सोवियत सेना की विजय के 60वर्ष की पूर्ति का दिन है जिसका सारी दुनिया के उत्पीड़ित जनगण के इतिहास में असीम महत्व है। इसी दिन सोवियत संघ की लाल सेना ने अकूत बलिदानों और बेमिशाल बहादुरी का परिचय देते हुए हिटलर की सेना को अंतिम रूप से पराजित किया था और जर्मनी के पार्लियामेंट राइखस्टाग पर लाल झंडा फहराया था। लाल सेना की विजय और नाजियों की पराजय की यह अंतिम लड़ाई 1941 के जून महीने में शुरू हुई थी जो 9 मई 1945 के दिन राइखस्टाग पर लाल झंडे को फहराने के साथ समाप्त हुई। सारी दुनिया के लोग लाल सेना की इस महान लड़ाई पर नजरे टिकाये हुए थे। इस लड़ाई में अकेले सोवियत सेना और सोवियत जनता के 2 करोड़ 70 लाख लोग मारे गये थे, 1710 शहर पूरी तरह से अथवा आंशिक रूप में विध्वस्त होगये थे, 70 हजार से ज्यादा गांव पूरी तरह से उजड़ चुके थे। लेनिनग्राद और मास्को की घेरेबंदी और स्तालिनग्राद में लाल सेना के जबर्दस्त प्रतिरोध की कहानी सारी दुनिया के सैन्य इतिहास में हमेशा स्वर्ण अक्षरों से लिखी रहेगी। उस समय कर्ुस्क के मैदान में हुआ टैंक युध्द आज तक का सबसे बड़ा टैंक युध्द माना जाता है। तब दुनिया के घर-घर में लाल सेना के मार्शलों और जैनरलों की बहादुरी के किस्से बड़े चाव के साथ सुनाये जाते थे। मार्शल जुकोव, रोकासोवस्की, सोकास्लोवस्की, कोनेव और सर्वोपरि सोवियत सेना के कमांडर इन चीफ जोसेफ स्तालिन के नाम हर घर तक पहुंच गये थे।
लाल सेना ने तब सिर्फ सोवियत संघ को विश्व मानवता की दुश्मन शक्ति से बचाने का काम नहीं किया था, उसने सारी दुनिया की रक्षा की थी और दुनिया के सभी उत्पीड़ित जनों की मुक्ति के पथ को प्रशस्त किया था। बर्लिन पहुंच कर लाल सेना ने कुख्यात आशविज यातना शिविर को मुक्त किया था जो इस धरती पर एक साक्षात नर्क था। यह शिविर नाजियों की चरम बर्बरता का प्रतीक था। यहां जो लोग भी जिंदा थे, उन सबको लाल सेना ने आजाद किया। लाल सेना की इस महान विजय का समूचे यूरोप और एशिया पर क्या असर पड़ा था, उस इतिहास से हम सभी परिचित है। लाल सेना की विजय के साथ ही पूर्वी यूरोप के कई देशों में वहां की जनता ने फासिस्टों के साथ सहयोग करने वाले सभी विश्वासघातियों को खदेड़ बाहर कर समाजवाद की स्थापना की। इसके दो वर्ष बाद ही भारत की आजादी के साथ सारी दुनिया में उपनिवेशवाद के अंत के युग का सूत्रपात हुआ। चीन की क्रांति भी इसी नये युग का परिणाम थी। इंडोनेशिया, सिंगापुर, मलयेशिया, वियतनाम आजाद हुए, कोरिया के एक हिस्से में समाजवाद कायम हुआ। मुक्ति की लहर लातिन अमरीका तक गयी और अमेरिका की नाक तले क्यूबा में समाजवाद की स्थापना हुई।
महोदय, हम सभी यह भी जानते हैं कि फासीवाद की पराजय से विश्व जनगण की मुक्ति का जो मार्ग प्रशस्त हुआ, उसे शुरू के दिन से ही दुनिया की अन्य साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी शक्तियां पसंद नहीं कर पा रही थी। विश्वयुध्द में जो ताकते सोवियत संघ के साथ मित्र शक्ति के रूप में लड़ रही थी, उन्होंने जर्मनी की पराजय के बाद दूसरे दिन से ही नये समाजवादी देशों में फिर से पूंजीवाद की स्थापना करने और नव-स्वाधीन देशों को फिर से अपने औपनिवेशिक जाल में जकड़ने की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया। उनका यह राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक अभियान शीत युध्द के रूप में शुरू हुआ। आज हम सभी जानते हैं कि अमेरिका ने दुनिया के 100 से भी ज्यादा स्थानों पर अपने सैनिक अव्े कायम कर लिये है। खास तौर पर 1989 के बाद, सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के देशों में समाजवाद के पराभव के बाद अमेरिका के नेतृत्व में एक नये प्रकार के उपनिवेशवाद ने सिर उठाना शुरू कर दिया है। हम यह साफ देख रहे हैं कि अलकायदा की तरह की जिन आतंकवादी ताकतों को अमेरिका का संरक्षण मिला हुआ था, उन्हीं के खात्मे के नाम पर अमेरिकी फौजों ने दुनिया के मध्यभाग और रणनीतिक दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। जनसंहारक हथियारों की मौजूदगी के कोरे झूठ के बल पर उन्हीं फौजों ने इराक पर अधिकार कर लिया है। खुद हमारा देश उनकी बेइंसाफियों को कम शिकार नहीं रहा है। जब हमने नाभकीय विस्फोट किये तो अमेरिका ने दुनिया में हमारे देश का हुक्का-पानी बंद करवा देने की कम कोशिशें नहीं की थी। आज शुध्द सामरिक शक्ति के बल पर अमेरिका-ब्रिटेन धुरी सारी दुनिया पर अपनी चौधराहट कायम करने पर आमादा है।
महोदय, इसके अलावा दुनिया के विभिन्न देशों में दक्षिणपंथी फासीवादी ताकतों ने जो नये सिरे से सिर उठाना शुरू किया है, फासीवाद की पराजय की इस 60वीं सालगिरह पर उस ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिये। हम अपने देश में भी सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों के उभार को साफ तौर पर देख पा रहे हैं। पिछले दिनों गुजरात में जिस प्रकार से अल्पसंख्यक समुदाय का जनसंहार संगठित किया गया, वह इन फासिस्ट ताकतों की ही एक करतूत थी। ये ताकते हमारे देश की एकता और आंतरिक सुरक्षा के लिये एक बड़ा खतरा बन रही है।
आज फासीवाद पर विजय की 60वीं सालगिरह के मौके पर हमें यह शपथ लेनी चाहिये कि हम अपने देश के स्वतंत्रता आंदोलन की साम्राज्यवाद-विरोध की परंपरा पर अटल रहते हुए हर प्रकार के फासीवादी रूझानों का पूरी शक्ति के साथ प्रतिरोध करेंगे। इस संसद को फासीवाद पर विजय की 60वीं सालगिरह के अवसर पर इस संकल्प के संदेश को देश के कोने-कोने में ले जाने के लिये वचनबध्द होना चाहिये।

1 टिप्पणी:

  1. जब एक तरफ पूरी दुनिया अपनी मुक्ति का उद्धोष कर हिटलर, च्‍यांग काई शेक और बतिस्‍ता का सफाया कर रही थी , उस समय एक फासीवादी दानव हमारे देश की धरती पर सिर उठा रहा था। आज जहां हमें अमेरिकी नव-साम्राज्‍यवाद का मुंहतोड जवाब देने के लिए जनता के हर तबके को एकजुट करना होगा, वहीं इस गहरे जम चुके फासीवादी दानव को अवाम के दिलोदिमाग से बाहर उखाड फेंकने के लिए हरके माध्‍यम को औजार बनाकर उनके बीच पंहुचना भी होगा।
    बहरहाल नेरुदा और चिली पर लिखी आपकी पुस्‍तक कुछ साल पहले पढी थी, और उसके जरिए उस पूरे दौर से परिचय प्राप्‍त हुआ जब हिटलरशाही की औलादें स्‍पेन और लातीन अमेरिका में सिर उठा रहीं थीं, उस समय की शेष रह गई बधाई आज आपको दे रहा हूं...

    उत्तर देंहटाएं